बिछी हुई है लम्हों की लौ
नंगे पैर उनपर चलते चलते
इतनी दूर आ गए हैं
कि अब भूल गए हैं जूते कहाँ उतारे थे
पर लगता है
कि अब उनकी ज़रुरत नहीं|

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